
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव और चिंता आम बात हो गई है। जहां आधुनिक चिकित्सा लक्षण पर काम करती है, वहीं आयुर्वेद बीमारी की जड़, यानी दिमाग और शरीर के असंतुलन पर प्रहार करता है।
आयुर्वेद के अनुसर, मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध हमारे ‘दोष’ (वात, पित्त, कफ) और ‘गुण’ से हैं। जब हमारे दिमाग में रजस और तमस बढ़ जाते हैं, तभी चिंता और तनाव पैदा होता है।
1. शक्तिशाली जड़ी-बूटियां (हर्बल सपोर्ट)
रिसर्च बताती है कि कुछ खास जड़ी-बूटियां ‘एडेप्टोजेन्स’ की तरह काम करती हैं, जो शरीर को तनाव झेलने की क्षमता देती हैं:
अश्वगंधा: ये शरीर में ‘कोर्टिसोल’ (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम करने में मदद करता है। इसे ‘रसायन’ माना जाता है जो नर्वस सिस्टम को ताकत देता है।
ब्राह्मी: अनुसंधान के अनुसर, ब्राह्मी दिमाग के डेंड्राइट्स (जो न्यूरॉन्स के बीच संदेश भेजते हैं) को बेहतर बनाती है, जिससे स्मृति और एकाग्रता सुधरती है।
जटामांसी: इसे प्राकृतिक ब्रेन टॉनिक कहा जाता है। ये दिमाग को ठंडा महसूस कराता है और नींद की समस्या (अनिद्रा) को दूर करने में सहायक है।
2. प्राणायाम और योग: सांस का विज्ञान
नर्वस सिस्टम को शांत करने के लिए स्वास (सांस) पर नियन्त्रण सबसे बड़ा हथियार है:
अनुलोम-विलोम: ये दिमाग के दोनों गोलार्धों (hemispheres) को संतुलित करता है।
भ्रामरी प्राणायाम: इसमे गुनगुनाहट ध्वनि से उत्पन्न होने वाली कंपन दिमाग के ऊतकों को आराम देती है, जो चिंता में राम-बाण इलाज है।
3. दिनचर्या और जीवनशैली (दैनिक दिनचर्या)
आयुर्वेद का मानना है कि एक नियमित दिनचर्या से दिमाग को सुरक्षा का एहसास होता है:
अभ्यंग (स्व-मालिश): हल्के गर्म तिल के तेल से शरीर की मालिश करने से ‘वात’ दोष शांत होता है, जो चिंता का मुख्य कारण है।
सात्विक आहार: ताजा, घर का बना खाना दिमाग में ‘सत्व’ गुण को बढ़ाता है, जिससे विचार शांत और सकारात्मक रहता है।
4. पंचकर्म: शुद्धीकरण की क्रिया
अगर तनाव बहुत पुराना है, तो ‘शिरोधारा’ एक बेहतर थेरेपी है। इसमे माथे (तीसरी आँख) पर धार के रूप में तेल गिराया जाता है। वैज्ञानिक तौर पर, ये ‘ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम’ को रेगुलेट करके गहरी शांति प्रदान करता है।
निष्कर्ष
आयुर्वेद सिर्फ दवा नहीं, बल्की जीने का एक तरीका है। जब हम प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलते हैं, तो दिमाग अपने आप को संतुलित कर लेता है। याद रखें, “स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्” – यानी स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना ही आयुर्वेद का पहला मकसद है।
ध्यान दें: किसी भी जड़ी-बूटी या उपचार को शुरू करने से पहले एक विशेषज्ञ आयुर्वेदिक डॉक्टर से सलाह जरूर लें, क्योंकि हर शरीर की प्रकृति अलग होती है।




